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देवी दर्शन करना है, तो गुजरना पड़ेगा खून से रंगी 5 किमी लंबी सड़क से… आइये बताते हैं इस मंदिर के बारे में

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If you want to see Goddess, then you will have to pass through a 5 km long road colored with blood ... let us tell about this temple

नवरात्र के अंतिम दो दिन अष्टमी और नवमी, जहां सामान्य तौर पर हवन- पूजन का पुण्य कार्य ही किया जाता है। वहीं आज हम आपको बताने जा रहे देवी के एक ऐसे मंदिर के बारे में जहां अष्टमी के मौके पर पशुओं की बलि दी जाती है। बलि भी ठीक है लेकिन अगर यह संख्या हजारों में हो तो…. जी हां, यहां अनुमान के मुताबिक 5 हजार से अधिक बकरों की बलि दी गई है। आस्था के आगे सरकारी फरमान को दरकिनार कर यहां की 5 किमी की सड़क खून से रंगी हुई है। हम बात कर रहे हैं ओड़िशा के कालाहांडी जिले के भवानीपटना की ईष्ट देवी माणिकेश्वरी मंदिर की। हमारे आदरणीय है साहू जी, देवी दर्शन के लिए जाने से पहले बता गये थे कहानी… तभी से विचार बना लिया था कि इस मंदिर के बारे में आप सभी को जरूर बतायेंगे… चलिए बढ़ते हैं  आगे

माणिकेश्वरी देवी मंदिर, जहां अष्टमी के मौके पर परम्परागत छत्र यात्रा निकाली गई। स्थानीय लोगों के अनुमान के मुताबिक यहां 5 हजार से अधिक बकरों की बलि दी गई। यहां कोई सरकारी फरमान काम नहीं करता, जिसकी वजह से यहां 5 किमी की सड़क पर खून से रंगी हुई मिली। बताया जाता है कि यहां हर वर्ष माताजी की छत्र यात्रा निकाली जाती है। जहां अष्टमी के पहले आधी रात को पारम्परिक विधि विधान के साथ मंदिर में देवी माणिकेश्वरी की प्रतिमा के उपर लगे छत्र को निकाल कर लगभग पांच किमी दूर शहर से बाहर एक निश्चित गहराई वाले जगह में रखा जाता है। फिर भोर होने से पहले बाजे गाजे के साथ पारम्परिक आदिवासी नृत्य के बीच जयकारा लगाते हुए छत्र को मंदिर लाया जाता है। इसी दौरान माणिकेश्वरी देवी पर आस्था रखने वाले मन्नत के अनुसार बकरा और मुर्गे की बलि देते हैं।

लेखनी कार्य के लिए साहू जी हमेशा मार्गदर्शन देते रहे हैं, आगे फिर मिलेंगे उनकी कलम से आपके लिए कुछ खास लेकर…

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छत्तीसगढ़ का ये नृत्य इससे पहले कभी नहीं देखा होगा आपने

हमारा दावा है कि इसके पहले शायद ही आपने प्रदेश की इस नृत्य शैली को कहीं देखा होगा। सोशल मीडिया के माध्यम से हमारे एक मित्र ने इसे हम तक पहुंचाया, तो हमने सोचा आप भी हमारे मित्र ही हैं आपका देखना तो बनता ही है…. आइए देखते हैं ये शानदार डांस…

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छत्तीसगढ़ आज अपने स्थापना की 19वीं वर्षगांठ मना रहा है। मध्यप्रदेश से अलग होकर एक आदिवासी बाहुल्य राज्य के रूप अलग हुआ छत्तीसगढ़ विभिन्न कलाओं से परिपूर्ण है। यहां के लोकनृत्य की भी देश में अपनी अलग ही पहचान है। सुआ नृत्य, चंदेनी, राउत नाचा. पंथी नृत्य सहित अनेकों लोकनृत्य यहां बहुत प्रचलित हैं। आज राज्य के स्थापना दिवस में हम भी आपको एक नृत्य दिखाने जा रहे हैं।

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कनाडा में रचने जा रहा इतिहास, सिटी काउंसिल ने सिक्ख समुदाय को दिया अनमोल तोहफा

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कनाडा में रचने जा रहा इतिहास, सिटी काउंसिल ने सिक्ख समुदाय को दिया अनमोल तोहफा

कनाडा के बैंपटन सिटी की डिक्सी रोड अब गुरूनानक स्ट्रीट के नाम से जानी जाएगी। यहां की सिटी काउंसिल ने गुरूनानक देव के प्रकाश पर्व के मौके पर सिक्ख समुदाय को ये अनमोल तोहफा दिया है। शहर के इस इलाके में इंडो- कनाडाई लोगों का वर्चस्व है।

यहां के क्षेत्रीय पार्षदों गुरप्रीत सिंह ढिल्लों और नगर पार्षद हरकीरत सिंह ने एक प्रस्ताव रखा था कि सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व के सम्मान में रोड का नाम श्री गुरु नानक देव जी के नाम पर रखा जाना चाहिए। इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया है। ब्रैंप्टन में रहने वाले दो लाख सिखों ने इस पर प्रशंसा की। प्रस्ताव पारित होने के बाद पार्षद ढिल्लों ने कहा कि ब्रैंप्टन दुनिया की सबसे बड़ी सिख आबादी में से एक है।

डिक्सी रोड पर बड़ा गुरुद्वारा साहिब भी है, जहां पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु रोजाना माथा टेकने आते हैं। ब्रैंप्टन ईस्ट से सांसद मनिंदर सिद्धू मैनी ने कहा कि कनाडा में यह एक नया इतिहास लिखा जा रहा है। अब श्री गुरु नानक देव के प्रकाशोत्सव पर गुरु नानक स्ट्रीट जनता को समर्पित कर दी जाएगी। सिद्धू ने कहा कि समूची सिख समुदाय के लोगों में इससे खुशी की लहर है। वहीं डिक्सी रोड पर कारोबार करने वाले परम सिद्धू का कहना है कि 550वें प्रकाशोत्सव पर यह तोहफा अनमोल है और इससे संगत में खासा उत्साह है।

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मंगल और चांद पर भी हो गया खाने का इंतजाम !

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मंगल और चांद पर भी हो गया खाने का इंतजाम !

जी हां, सही सुना आपने…. अगर मंगल और चांद पर पर लोगों के रहने के लिए व्यवस्था बनाई जाती है तो उसके लिए खाने की अब कोई चिंता नहीं होगी। नासा के वैज्ञानिकों ने इसका जुगाड़ कर लिया है। नासा के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम रूप से मंगल ग्रह और चंद्रमा जैसा वातावरण और मिट्टी तैयार कर उसमें फसल उगाने में सफलता पाई है। उनका मानना है कि वहां खाद्य पदार्थ उगाए जा सकेंगे।

नीदरलैंड के वगेनिंगेन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि मंगल और चंद्रमा पर उगाई गई फसल से बीज भी प्राप्त किए जाने की संभावना है ताकि नयी फसल की जा सके। उन्होंने हलीम, टमाटर, मूली, राई, क्विनोआ, पालक और मटर समेत दस अलग-अलग फसल उगाई।

वगेनिंगेन यूनिवर्सिटी के वीगर वेमलिंक ने कहा कि जब हमने कृत्रिम रूप से तैयार की गई मंगल ग्रह की मिट्टी में उगे पहले टमाटरों को लाल होते देखा तो हम उत्साह से भर गए थे। इसका मतलब था कि हमने सतत कृषि पारिस्थितिकी तंत्र की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं।

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