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हमर लपरहा टीम

हमारा समूह ऐसे सदस्यों से भरा पड़ा है जो बहुत कुछ करने की इच्छा रखते हैं पर किसी वजह से एक दायरे तक सिमट चुके हैं। चाह अब भी वही चांद तक जाने की लेकिन जिंदगी की भागादौड़ी में शाम तक ठीक से चल नहीं पाते। खैर, जोश के टॉनिक ने एक बार फिर से अंदर से आवाज लगाई कि

जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी और हम निकल पड़े इस सफर पर… बस एक ही ख्याल अब मन में है। साझा करते हैं आपसे …

यूँ ही चला चल राही, यूँ ही चला चल राही
जीवन गाड़ी है समय पहिया, आँसू की नदियाँ भी हैं
ख़ुशियों की बगियाँ भी हैं, रास्ता सब तेरा तके भैया…

आइए हमारी टीम से परिचय कराते हैं आपका, लेकिन एक बात ध्यान रखें इन सभी पात्रों का वास्तविकता से गहरा नाता है लेकिन नाम और काम पूरी तरह काल्पनिक हैं। यदि किसी व्यक्ति या घटना से इसकी समानता पाई जाती है तो इसे मात्र एक संयोग ही कहा जाएगा।

भइया मस्तराम

ये हमारे इस समूह के सबसे नटखट सदस्य, जिस जोश के टॉनिक की हम उपर बात कर रहे थे वो इनकी ही दी हुई है। पता नहीं भाई हमारे कौन से बाबा का चूरण खाते हैं कि सुबह 6 बजे से अगले दिन के सुबह 5.59 तक इनका दिमाग Sharply काम करता है। हर चीज को रेल बनाने का इरादा रखते हैं। इस पूरी योजना के प्रणेता यहीं हैं। एक बात का ध्यान रखें इनका उस कामुक पुस्तिका से किसी प्रकार का संबंध नहीं है। बाकी इंतजार कीजिये इनकी मुखबिरी हम आपसे करते रहेंगे।

जोजवा टुरा

जैसा कि नाम से आप समझ ही गए होंगे ए टुरा हा अब्बड़ जोजवा हरे, बाकी काम एक नंबर के करत हे। क्रिएटिविटी इतनी की भंगार को हाहाकार बना दें। हमारे आदरणीय हैं, जोश के टॉनिक के अलावा एक और टॉनिक इन्हें काफी पसंद है और अगर वो इन्हें मिल जाए तो फिर क्या कटप्पा औऱ क्या बाहुबली सब इनके सामने नतमस्तक हैं। बुद्धि विकास केंद्र ही है इनकी उर्जा का मुख्य स्त्रोत है। इनके बारे में आगे फिर बतायेंगे आपको विस्तार से …

हमारे खुरचनभाई

इनकी शैली के बारे में आपको सबसे पहले बताते हैं भाई हमारे बंग बाबू हैं। याने कि बिहारी बाबू वो भी बंग्ला सटाइल में। जिस इरादे की हम बात कह रहे थे वो इरादा हमें इन्हीं से प्रेरित होकर मिला है। ये हर बात में “कह के लेते हैं”। बोली तो इनकी ऐसी की पहले अल्फाज में ही कोई समझ जाए की साहब साहित्यकार हैं लेकिन इनकी शब्दों की गहराई को आज तक कोई समझ नहीं पाया है। जब ये बॉलिंग करते हैं तो कोई अंदाजा नहीं लगा सकता है कि टप्पा खाने के बाद बॉल कहां जाएगी, स्विंग होगी या यार्कर… यह शोध का विषय हो सकता है।

गंगाधर उर्फ शक्तिमान

बात हमारी हो रही है… अब तारीफ करूं क्या उसकी जिसने मुझे बनाया। वैसे तो बहुत ही शरीफ हैं हम, रोते- गाते रहते हैं लेकिन जब- जब अंधेरा कायम होता है तो हमारी इंद्रियां कार्य करने लगती हैं और शक्तिमान बनकर हम उसके सर्वनाश के लिए आगे बढ़ चलते हैं। हम भी मिलते रहेंगे आपसे…